Poetry

प्रकृति का बुलावा (Nature’s Call)

घड़ी में टक टक हुए जा रही थी
धड़कन मेरी तेज़ हुए जा रही थी
न जाने क्यों मन में हलचल हो रही थी
कि आज तो कुछ काण्ड होए!

रास्ता कोई भी न नज़र आ रहा था
बेबसी का मानो समा छा रहा था
मंद मंद मेरा दिल भी अब घबरा रहा था
कि यह हर बार क्यों होए!

बारिश की छम छम आज तरसा रही थी
जान मेरी पल पल जाए ही जा रही थी
ख्याबो में बस 1 तमन्ना उमड़ रही थी
कि बस वो हासिल होए!

मौसम और ठंडा हुए ही जा रहा था
कभी पैर तो कभी पेट, मैं सहला रहा था
और अब यह दर्द मैं न सह पा रहा था
बस और न बर्दाश्त होए!

तभी गाड़ी को छोड़ मैं भागा
बारिश में भीगा-भागा
क्यों था में इतना अभागा
कि सब गलत 1 साथ ही होए!

पर फिर 1 रोशनी झिलमिलाई
मेरी सास में सास आई
शायद किस्मत ने ली थी अंगड़ाई
जो थी अबतक सोए!

देख मेरी हालत 1 आदमी मुस्कुरा रहा था
पर मेरी मंज़िल का रास्ता भी वो दिखा रहा था
और मेरा पेट अब चिल्ला रहा था
कि भाग इससे पहले काम खराब होए!

आह!!

वो संतुष्टि की आह सुहानी थी
और बारिश की छम छम अब लग रही दिवानी थी
सिर्फ अंदर के गंद के निकलते ही दुनिया हसीन होने वाली थी
ऐसे कभी न सोचा होए!
क्यूंकि यह मन बड़ा बलवान है
मुश्किल में इसका चंचल होना आम है
और तब इसे जीतकर जो लड़ सके
उसी का उद्धार होए!

P.S.: This poem is dedicated to all the public toilets. They help me at mind .:P
The poem is based on true events. 😉

Please forgive me if I have made any spelling or grammatical error. I tried my best to recall all the rules from the Hindi classes I had in school. And last, if it has made you smile, do share it with the people who understand Hindi 😀

One thought on “प्रकृति का बुलावा (Nature’s Call)

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